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- वेदों के अन्तिम भाग या उच्चतम दर्शन को वेदान्त या उपनिषद् कहा जाता है.
- ब्रह्मसूत्र उपनिषदों की शिक्षा का संक्षिप्त सार है.
- सच्चा यज्ञ अपने अहं का त्याग है और परम लक्ष्य परम चैतन्य के साथ एकाकार होना है.
- उपनिषदों में परम सत्य के लिए ‘ब्रह्म’ शब्द प्रयुक्त हुआ है जिससे यह विश्व प्रकट होता है.
- ब्रह्म सत्य है, ज्ञान है, अनन्त है, आनन्द है.
- वह भगवान् सम्पूर्ण जीवों के अन्त:करणों में स्थित, सर्वव्यापी और मंगलरूप (शिव) है.
- परमात्मा सबकी कामनाओं को पूरा करने वाला है.
- सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही ब्रह्म का शरीर या विराट रूप है किंतु उस पर मानव रूप या मानवीय गुण आरोपित नहीं करना चाहिए.
- ब्रह्म और उसकी सृष्टि को अलग नहीं किया जा सकता.
- आत्मा ही ब्रह्म है और चार पादों वाला है.
- सर्वव्यापक आत्मा को जानकर बुद्धिमान पुरुष शोक नहीं करता.
- मनुष्य जो क्रिया करता है उसकी प्रतिक्रिया कर्मफल भोगने के रूप में होती है.
- जगत् ईश्वर की माया की शक्ति द्वारा रचा गया है, पर व्यक्तिगत आत्मा को माया ने अज्ञान में बाँध रखा है.
- उपनिषदें ‘अपरा विद्या’, निम्नतर ज्ञान और ‘परा विद्या’, उच्चतर ज्ञान में अन्तर करती हैं.
- यदि हम दुष्कर्म से बचते नहीं हैं, यदि हमारा मन स्थिर नहीं है, तो हम आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते.
- कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए.
- ईश्वर दण्ड नहीं देता. कर्म की प्रतिक्रिया अन्यायी को दण्ड देती है.
- आत्मनिग्रह आध्यात्म के लिये आवश्यक है किन्तु इसका अर्थ जगत् की उपेक्षा करना अथवा गृह और सम्पत्ति का त्याग करना नहीं है.
- उपनिषदों का परम लक्ष्य मोक्ष है.
- उपनिषदों में ओम् शब्द पूर्ण परमेश्वर का पर्याय है.
- उठो, जागो और परम ज्ञान प्राप्त करो.

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वेदों के अन्तिम भाग या उच्चतम दर्शन को वेदान्त या उपनिषद् कहा जाता है. अब वेदान्त शब्द का प्रयोग उस विशेष दर्शन के लिए भी होता है जो उपनिषदों पर आधारित है. शंकर ‘उपनिषद्’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘सद्’ धातु से मानते हैं, जिसका अर्थ है मुक्त करना, पहँचना या नष्ट करना. यह एक विशेष्य है जिसमें ‘उप’ और ‘नि’ उपसर्ग और क्विप् प्रत्यय लगे हैं. इसके अनुसार उपनिषद् का अर्थ होता है ब्रह्मज्ञान, जिसके द्वारा अज्ञान से मुक्ति मिलती है. दूसरे अर्थ में ‘उप’ (समीप) ‘नि’ (अच्छी तरह) और ‘सद्’ (बैठना) अर्थात् परमात्मा के समीप अच्छी तरह बैठाना ही उपनिषद् का ध्येय है. जिन ग्रन्थों में ब्रह्मज्ञान की चर्चा रहती है वे उपनिषद् कहलाते हैं. उपनिषदों में आध्यात्मिक अन्तर्दृष्टि एवं दार्शनिक तर्क प्रणाली दोनों के दर्शन होते हैं. श्वेताश्वतरोपनिषद् के अनुसार परमेश्वर वेदों के गुह्य भाग उपनिषदों में निहित है (तद्वेद गुह्योपनिषत्सु गूढ़ं). उपनिषद् ऐसा साहित्य है जो आदि काल से विकसित हो रहा है. भारतीय परम्परा में उपनिषदों की संख्या एक सौ आठ मानी गयी है. शंकराचार्य ने ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, बृहद् आरण्यक और श्वेताश्वतर- इन ग्यारह उपनिषदों का भाष्य किया है और ये ही सर्वसुलभ हैं.

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उपनिषदों में परम सत्य के लिए ‘ब्रह्म’ शब्द प्रयुक्त हुआ है. यह ‘बृह्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ ‘बढ़ना’,‘बाहर को फूटना’ होता है. इस व्युत्पत्ति से उमड़ती, उफनती, अनवरत वृद्धि ‘बृहत्तवम्’ की व्यंजना होती है. विश्व आत्मा और उससे मिलने की आकांक्षा रखने वाली मनुष्य की आत्मा में जो मूल सम्बन्ध है, ब्रह्म शब्द उसका अभिव्यंजक है. मुण्डकोपनिषद् में ब्रह्म के स्वरूप के सम्बन्ध में कुछ कहने के पूर्व यह कहा गया है कि दो विद्याएँ जानने योग्य हैं- एक परा और दूसरी अपरा. उनमें ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष का अध्ययन अपरा विद्या के अन्तर्गत किया जाता है तथा जिससे उस अक्षर ब्रह्म का ज्ञान होता है वह परा है. जिस प्रकार मकड़ी जाले को बनाती और निगल जाती है, जैसे पृथिवी में ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं और जैसे सजीव पुरुष से केश और लोम उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार उस अक्षर ब्रह्म से यह विश्व प्रकट होता है. ज्ञानेन्द्रियों के लिए ब्रह्म अदृश्य, अग्राह्य, हाथ-पैर से हीन, अत्यन्त सूक्ष्म है किन्तु सम्पूर्ण भूतों का कारण होने से विवेकी लोग उसे सर्वत्र देखते हैं. जिस प्रकार अत्यन्त प्रदीप्त अग्नि से उसी के समान रूप वाले हजारों स्फुलिंग (चिनगारियाँ) निकलते हैं, उसी प्रकार ब्रह्म से अनेकों भाव प्रकट होते हैं और उसी में लीन हो जाते हैं.

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ब्रह्म निश्चय ही दिव्य, अमूर्त, बाहर-भीतर विद्यमान, अजन्मा, अप्राण, मनोहीन, विशुद्ध तथा अपने सम्पूर्ण विकारों से श्रेष्ठ है ब्रह्म से ही प्राण उत्पन्न होता है तथा इससे ही मन, सम्पूर्ण इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, तेज, जल और सारे संसार को धारण करने वाली पृथिवी उत्पन्न होती है. सूर्य, चन्द्रमा, तारे, अग्नि आदि सब उसी के प्रकाश से प्रकाशमान हैं. यह अमृत ब्रह्म ही आगे है, ब्रह्म ही पीछे है, ब्रह्म ही दायीं-बायीं ओर है तथा ब्रह्म ही नीचे-ऊपर फैला हुआ है. यह सारा जगत् सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म ही है. वह महान् दिव्य और अचिन्त्य रूप है. वह सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर भासमान होता है तथा दूर से भी दूर और इस शरीर में अत्यन्त समीप भी है. वह चेतनावान् प्राणियों में इस शरीर के भीतर उनकी बुद्धि रूप गुहा में छिपा हुआ है. तैत्तिरीय उपनिषद् कहती है कि ‘‘जिससे ये सत्ताएँ जन्मी हैं, जिसमें जन्म लेने के बाद रहती हैं और जिसमें अपनी मृत्यु के बाद चली जाती हैं, वह ब्रह्म है.’’ यह निश्चित रूप से घोषणा करती है कि ब्रह्म सत्य है, ज्ञान है, अनन्त है (सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म). आनन्द ब्रह्म है (आनन्दो ब्रहनेति). आनन्द से ही सब जीव पैदा होते हैं और आनन्द में ही फिर समा जाते हैं.

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बृहदारण्यक उपनिषद् का यह कहना है कि ब्रह्म सत् है, ‘सन्मात्र हि ब्रह्म’. ऋग्वेद भी ब्रह्म के लिए सत् का प्रयोग कर कहता है कि सत् तो एक ही है, विद्वान लोग उसे भिन्न-भिन्न दृष्टि से देखते हैं. सत् विशुद्ध स्वीकृति का द्योतक है, जिसमें किसी भी प्रकार का अस्वीकार नहीं है. सत् के सत्य को माने बिना हम युक्तियुक्त जीवन नहीं जी सकते. छान्दोग्य उपनिषद् के अनुसार यह सारा जगत् निश्चय ही ब्रह्म है (सर्वं खल्विदं ब्रह्म), यह उसी से उत्पन्न होने वाला, उसी में लीन होने वाला और उसी में चेष्टा करने वाला है. वह (ब्रह्म) मनोमय, प्राणशरीर, प्रकाशस्वरूप, सत्यसंकल्प, आकाशशरीर, सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगन्ध, सर्वरस, इस सम्पूर्ण जगत् को सब ओर से व्याप्त करने वाला, वाक्-रहित और सम्भ्रमशून्य है. श्वेताश्वतर उपनिषद् के अनुसार ब्रह्म न स्त्री है, न पुरुष है और न नपुंसक ही है. यह जो-जो शरीर धारण करता है उसी-उसी से सुरक्षित रहता है. जिससे उत्कृष्ट और कोई नहीं है तथा जिससे छोटा और बड़ा भी कोई नहीं वह अपनी द्योतनात्मक महिमा में वृक्ष के समान निश्चल भाव से स्थित है, उस पुरुष ने ही इस सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त कर रखा है. वह भगवान् सम्पूर्ण जीवों के अन्त:करणों में स्थित और सर्वव्यापी है; इसलिए सर्वगत और मंगलरूप (शिव) है. वह महान्, परम समर्थ, शरीर रूप पुर में शयन करने वाला, अन्त:करण को प्रेरित करने वाला, सबका शासक, प्रकाशस्वरूप और अविनाशी है. वह समस्त इन्द्रिय वृत्तियों के रूप में अवभासित होता हुआ भी समस्त इन्द्रियों से रहित है, तथा सबका प्रभु, शासक और सबका आश्रय एवं कारण है. वह हाथ-पाँव से रहित होकर भी वेगवान् और ग्रहण करने वाला है, नेत्रहीन होकर भी देखता है और कर्णरहित होकर भी सुनता है. वह सर्वज्ञ है किन्तु उसे जानने वाला कोई नहीं है.

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ऋषियों ने उसे सबका आदि, पूर्ण और महान् कहा है. यह अणु से भी अणु और महान् से भी महान् (अणोरणीयान् महतो महीयान्) परमात्मा इस जीव के अन्त:करण में स्थित है. ब्रह्मवेत्ता लोग उसके जन्म का अभाव बतलाते हैं और उसे नित्य कहते हैं, वह जराशून्य पुरातन सर्वात्मा विभु होने के कारण सर्वगत है. समस्त प्राणियों में स्थित एक देव है; वह सर्वव्यापक समस्त भूतों का अन्तरात्मा, कर्मों का अधिष्ठाता, समस्त प्राणियों में बसा हुआ, सबका साक्षी, सबको चेतनत्व प्रदान करने वाला, शुद्ध और निर्गुण है. जो एक अद्वितीय स्वतन्त्र परमात्मा बहुत से निष्क्रिय जीवों के एक बीज को अनेक रूप कर देता है, अपने अन्त:करण में स्थित उस देव को जो मतिमान् देखते हैं उन्हें ही नित्यसुख प्राप्त होता है, दूसरों को नहीं. वह परमात्मदेव नित्यों में नित्य है, चेतनों में चेतन. बहुतों में एक हैं. सबकी कामनाओं को पूरा करने वाला है. ज्ञान से, योग से उस कारण पुरुष को जान लेना चाहिए. ऐसा करने से मनुष्य सब प्रकार के बन्धनों से मुक्त हो जाता है.

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समस्त जगत् अथवा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही ब्रह्म का शरीर या उसका विराट रूप है. किन्तु ईश्वर के व्यक्तित्व की कल्पना मानवीय लीकों पर नहीं करनी चाहिए. उसे एक विराट पुरुष के रूप में नहीं सोचना चाहिए. दिव्य में हमें मानवीय गुण, जैसे कि वे हमें ज्ञात हैं, आरोपित नहीं करना चाहिए. कुछ लोग मानवीय शक्ति के अनुरूप और व्यक्तित्व की अपनी धारणा के अनुसार ईश्वर की कल्पना करने का प्रयत्न करते हैं और ईश्वर की प्रतिमा बना देते हैं. पुराणों में इसी प्रकार के प्रयत्न किये गये हैं किन्तु समस्त चित्र काल्पनिक हैं. यदि ईश्वर के सहस्त्र हाथ, सहस्त्र नेत्र, सहस्त्र मुख आदि की बात कही जाती है तो उसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि इस प्रकार की आकृति वाला कोई पुरुष है. इस प्रकार के कथन उपमा के रूप में कहे हुए होते हैं. फिर भी सूक्ष्म या निरपेक्ष ब्रह्म से जगत् के निर्माण तक सत्य की चार मुद्राएँ या स्थितियाँ मिलती हैं‒ (1) निरपेक्ष, ‘ब्रह्म’ (2) सृजनात्मक शक्ति, ‘ईश्वर’ (3) विश्व आत्मा, ‘हिरण्यगर्भ’ और (4) जगत् . माण्डूक्य उपनिषद् कहती है कि ब्रह्म ‘चतुष्पात्’ चार पैरों वाला है और उसके चार तत्त्व ‘ब्रह्म’, ‘ईश्वर’, ‘हिरण्यगर्भ’ और ‘विराज’ हैं. निरपेक्ष की, जब जैसा कि वह अपने-आप में है, हर प्रकार के सृजन से स्वतन्त्र कल्पना की जाती है, तो वह ‘ब्रह्म’ कहलाता है. जब उसे इस रूप में सोचा जाता है कि उसने अपने-आपको विश्व में व्यक्त किया है तो वह ‘विराज’ कहलाता है. जब उसे उस आत्मा के रूप में सोचा जाता है जो विश्व में सर्वत्र गतिशील है, तो वह ‘हिरण्यगर्भ’ कहलाता है. जब उसकी विश्व के स्रष्टा, रक्षक, और संहारक के रूप में कल्पना की जाती है, तो वह ‘ईश्वर’ कहलाता है. एक ही ईश्वर स्रष्टा के रूप में ‘ब्रह्मा’, पालनकर्ता के रूप में ‘विष्णु’ और संहारक के रूप में ‘शिव’ बन जाता है. ये चार प्रकार हमारी मानसिक दृष्टि के लिए हैं, जो केवल ऊपरी तौर पर पर ही पृथक किये जा सकते हैं. निरपेक्ष सत् चिन्तन का विषय या उत्पादन का परिणाम नहीं है. उसे केवल नकारात्मक शब्दों में या उपमा द्वारा व्यक्त किया जा सकता है. किन्तु नकारात्मक लक्षणों (नेति, नेति) से हमें इस भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए कि ब्रह्म असत्ता है. वह जहाँ अनुभवातीत है, वहाँ यह समूचा जगत् उसमें अर्न्तभूत है.

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माण्डूक्य उपनिषद् कहती है कि सब कुछ ब्रह्म ही है. साथ ही यह भी कहती है कि आत्मा ही ब्रह्म है. वह यह आत्मा चार पादों वाला है. यह उपनिषद् चेतना की चार अवस्थाओं ‒ जागरित, स्वप्न, प्रगाढ़ निद्रा और प्रकाशमय चेतन का विश्लेषण कर यह प्रतिपादित करती है कि इनमें से अन्तिम शेष तीन का आधार है. आत्मा का प्रथम पाद ‘वैश्वानर’ है जो जाग्रत् अवस्था या ब्रह्म के प्रकटीभूत रूप को दर्शाता है. इस अवस्था में आत्मा स्थूल विषयों का भोक्ता है. स्वप्न जिसका स्थान है तथा जो अन्त:प्रज्ञ है और सूक्ष्म विषयों का भोक्ता है, वह तैजस आत्मा का दूसरा पाद है. जिस अवस्था में सोया हुआ पुरुष किसी भोग की इच्छा नहीं करता और न स्वप्न ही देखता है उसे सुषुप्ति कहते हैं. वह सुषुप्ति जिसका स्थान है तथा जो एकभूत प्रकृष्ट ज्ञानस्वरूप होता हुआ ही आनन्दमय, आनन्द का भोक्ता और चेतनारूप मुख वाला है वह प्राज्ञ ही आत्मा का तीसरा पाद है. अपने स्वरूप में स्थित यह प्राज्ञ ही सर्वेश्वर है, सर्वज्ञ है, अन्तर्यामी है और समस्त जीवों की उत्पत्ति तथा लय का स्थान होने के कारण यह सबका कारण भी है. विभु विश्व बहिष्प्रज्ञ है, तैजस अन्त:प्रज्ञ है तथा प्राज्ञ घनप्रज्ञ (प्रज्ञानघन) है. इस प्रकार एक ही आत्मा तीन प्रकार से कहा जाता है. विश्व सर्वदा स्थूल पदार्थों को ही भोगने वाला है, तैजस सूक्ष्म पदार्थों का भोक्ता है तथा प्राज्ञ आनन्द को भोगने वाला है. यह सुनिश्चित बात है कि जो पदार्थ विद्यमान होते हैं उन्हीं सबकी उत्पत्ति हुआ करती है. बीजात्मक प्राण ही सबकी उत्पत्ति करता है और चेतनात्मक पुरुष चैतन्य के आभासभूत जीवों को अलग-अलग प्रकट करता है. सृष्टि के विषय में विचार करने वाले दूसरे लोग भगवान् की विभूति को ही जगत् की उत्पत्ति मानते हैं तथा दूसरे लोगों द्वारा यह सृष्टि स्वप्न और माया के समान मानी गयी है. कोई-कोई सृष्टि के विषय में ऐसा निश्चय रखते हैं कि ‘प्रभु की इच्छा ही सृष्टि है’. काल के विषय में विचार करने वाले ज्योतिषी लोग काल से ही जीवों की उत्पत्ति मानते हैं. कुछ लोग ‘सृष्टि भोग के लिए है’ ऐसा मानते हैं और कुछ ‘क्रीडा’ के लिए है’ ऐसा समझते हैं. परन्तु वास्तव में तो यह भगवान् का स्वभाव ही है; क्योंकि पूर्णकाम को इच्छा ही क्या हो सकती है. आत्मा का चौथा पाद सम्पूर्ण शब्द प्रवृत्ति के निमित्त से रहित है. अत: शब्द से उसका वर्णन नहीं किया जा सकता. अत: आत्मा के चौथे पाद ‘तुरीय’ के स्वरूप का वर्णन करना कठिन है. फिर भी विवेकीजन तुरीय को ऐसा मानते हैं कि वह न अन्त:प्रज्ञ है, न बहिष्प्रज्ञ है, न उभयत: (अन्तर्बहि:) प्रज्ञ है, न प्रज्ञानघन है, न प्रज्ञ है और न अप्रज्ञ है. बल्कि अदृष्ट, अव्यवहार्य, अग्राह्य, अलक्षण, अचिन्त्य, एकात्म प्रत्ययसार, प्रपंच का उपशम, शान्त, शिव और अद्वैत् रूप है. वही आत्मा है, वही साक्षात् जानने योग्य है. तुरीय आत्मा सब प्रकार के दु:खों की निवृत्ति में समर्थ है.

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प्रारम्भिक चिन्तन में आत्मा को वैयक्तिक चेतना के तत्त्व के रूप में तथा ब्रह्म को व्यवस्थित विश्व के आधार के रूप में देखा गया है. किन्तु यह भेद धीरे-धीरे कम होने लगता है और दोनों एकाकार हो जाते हैं. आत्मा को यदि नापना हो तो हमें उसे ईश्वर से नापना चाहिए, क्योंकि ईश्वर का धरातल और आत्मा का धरातल एक ही है. छान्दोग्य उपनिषद् कहती है कि वस्तुत: यह समस्त जगत् ब्रह्म है और यह कि हृदय के अन्दर जो यह मेरी आत्मा है, वह ब्रह्म है. वह पुरुष जो ज्ञान-चक्षु में ज्ञानियों को दिखायी देता है वह आत्मा है, अर्थात् ब्रह्म है. विश्व का आदि तत्त्व, ब्रह्म व्यक्ति के आन्तरिक आत्म, आत्मा द्वारा जाना जाता है. चेतना की चार अवस्थाओं- जागरित, स्वप्न, सुषुप्ति और आत्मिक चेतना- के अनुरूप व्यक्ति की भी चार अवस्थाएँ हैं: ‘स्थूल’, ‘सूक्ष्म’, ‘कारण’ और ‘शुद्ध आत्म’. जिस प्रकार ‘ईश्वर’ जगत् का कारण है उसी प्रकार ‘कारण’ आत्म सूक्ष्म और स्थूल शरीरों के विकास का स्रोत हैं. ‘नारायण’ मनुष्य में विद्यमान ईश्वर है, जो निरन्तर ‘नर’ (मनुष्य) के साथ रहता है. वह मरणशील प्राणियों में रहने वाला शाश्वत तत्त्व है जो शरीर, प्राण, मन और बुद्धि से भिन्न है. आत्मा मनुष्य के जीवन का वह तत्त्व है जो उसकी सत्ता में, प्राण में व्याप्त है और उनसे परे है. कठोपनिषद् के अनुसार आत्मा न उत्पन्न होता है, न मरता है. यह अजन्मा सदा से वर्तमान, सर्वदा रहने वाला और पुरातन है तथा शरीर के मारे जाने पर भी स्वयं नहीं मरता. यदि मारने वाला आत्मा को मारने का विचार करता है और मारा जाने वाला उसे मारा हुआ समझता है तो वे दोनों ही उसे नहीं जानते; क्योंकि यह न तो मारता है और न मारा जाता है. यह अणु से अणुतर और महान् से महत्तर आत्मा की हृदय रूप गुहा में स्थित है. जो शरीरों में शरीररहित तथा अनित्यों में नित्य स्वरूप है उस महान् और सर्वव्यापक आत्मा को जानकर बुद्धिमान पुरुष शोक नहीं करता. यह आत्मा वेदाध्ययन द्वारा प्राप्त होने योग्य नहीं है और न धारण शक्ति अथवा अधिक श्रवण से ही प्राप्त हो सकता है. साधक जिस आत्मा का वरण करता है उस आत्मा से ही यह प्राप्त किया जा सकता है. उसके प्रति यह आत्मा अपने स्वरूप को अभिव्यक्त कर देता है.

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सर्वव्यापी आत्मा का जीवात्माओं से क्या सम्बन्ध है? इस विषय में विभिन्न मत हैं. शंकर यह मानते हैं कि सर्वव्यापी आत्मा जीवात्मा से अभिन्न है. रामानुज कहते हैं कि जीवात्मा सर्वव्यापी आत्मा से शाश्वत रूप से अभिन्न है और भिन्न भी है. मध्व के अनुसार, जीवात्मा सर्वव्यापी आत्मा से शाश्वत रूप से भिन्न है. जीव को, एक प्रकार से, ईश्वर ने अपने रूप के अनुरूप और अपने सदृश रचा है. परन्तु सृष्ट के नाते उसका अपना रूप है. जीव के बिना न तो बन्धन हो सकता है और न मुक्ति. आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि मनुष्य सजीव सत्ताओं की शृंखला की एक कड़ी है, अनेक में से एक है. विज्ञान यह भी मानता है कि प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया होती है. इसी को हम इस प्रकार भी कह सकते हैं कि मनुष्य जो क्रिया करता है उसकी प्रतिक्रिया कर्मफल भोगने के रूप में होती है. जीवात्मा ही उपनिषदों के अनुसार कर्मफल भोगता है और कर्म ही उसे बन्धन में डालते हैं. कठ उपनिषद् जब यह कहती है कि परमेश्वर कर्मों का फल भोगता है (1-3-1), तो उसका संकेत यह होता है कि हम ईश्वर के प्रतिरूप और छवियाँ हैं, और जब हम अपने कर्मों का फल भोगते हैं तो वह भी भोगता है. इसी उपनिषद् के अनुसार आत्मा को रथी, शरीर को रथ, बुद्धि को सारथि और मन को लगाम समझना चाहिए. विेवेकी पुरुष इन्द्रियों को घोड़े बतलाते हैं तथा उनके घोड़े रूप से कल्पित किये जाने पर विषयों को उनके मार्ग बतलाते हैं और शरीर, इन्द्रिय एवं मन से युक्त आत्मा को भोक्ता कहते हैं. किन्तु जो बुद्धि रूप सारथि सर्वदा अविवेकी एवं असंयत चित्त से युक्त होता है उसके अधीन इन्द्रियाँ दुष्ट और बेकाबू घोड़ों के समान व्यवहार करती हैं. इसके विपरीत जो बुद्धि रूप सारथि कुशल और सर्वदा समाहित चित्त से युक्त होता है उसके अधीन इन्द्रियाँ इस प्रकार रहती हैं जैसे सारथि के अधीन अच्छे घोड़े. जो मनुष्य विवेकयुक्त बुद्धि-सारथि से युक्त और मन को वश में रखने वाला होता है, वह संसारमार्ग से पार होकर उस विष्णु (व्यापक परमात्मा) के परमपद को प्राप्त कर लेता है. आत्मा की एकता से जीवात्माओं के भेद असंगत नहीं हो जाते हैं. विभिन्न जीवात्माएँ ‘बुद्धि’ के साथ अपने संयोग के कारण भिन्न रहती हैं और इसलिए उनके कर्म के फल अलग-अलग होते हैं (बुद्धिभेदेन शेक्तृभेदात्). प्रत्येक मानव-शरीर में अमरता और मृत्यु दोनों के तत्त्व स्थित हैं. भ्रम के पालन से हम मृत्यु प्राप्त करते हैं, सत्य के पालन से हम अमरता प्राप्त करते हैं.

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ईशावास्योपनिषद् के अनुसार जगत् में जो कुछ स्थावर-जंगम संसार है, वह सब ईश्वर के द्वारा आच्छादनीय है. भगवान् पूर्ण हैं और चूँकि वे पूरी तरह अखण्ड हैं, अतएव उनके सारे उद्भव, तथा यह व्यवहार जगत् पूर्ण के रूप में परिपूर्ण है. पूर्ण से जो कुछ उत्पन्न होता है वह भी अपने में पूर्ण होता है. चूँकि वे पूर्ण हैं, अतएव उनसे न जाने कितनी पूर्ण इकाइयाँ उद्भूत होती हैं, तो भी वे पूर्ण रहते हैं (ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते. पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते.) ब्रह्म अपनी पूर्णता को खोये बिना जगत् का आधार है. सभी विशेषताओं से रहित होते हुए भी ब्रह्म जगत् का मूल कारण है. यदि कोई वस्तु किसी अन्य वस्तु से अलग टिक नहीं सकती तो दूसरी वस्तु उसका सार होती है. कारण का कार्य से पहले होना तर्कसिद्ध है. जिस प्रकार पृथिवी की वनस्पतियों को पृथिवी से अलग करके देखना अज्ञान का द्योतक है वैसे ही जगत् को परमेश्वर से अलग करके स्वतन्त्र अस्तित्व के रूप में देखना अज्ञान का कार्य है. जगत् ईश्वर की, सक्रिय प्रभु की रचना है.जगत् ईश्वर में और ईश्वर जगत् में समाया हुआ है. छान्दोग्य उपनिषद् में ब्रह्म को ‘तज्जलान्’ कहा गया है, अर्थात् वह (तत्) जो जगत् को जन्म देता है (ज), अपने में लीन कर लेता है (ला) और कायम रखता है (अन्). जगत् ब्रह्म में से आता है और ब्रह्म में लौट जाता है. जगत् ईश्वर की माया की शक्ति द्वारा रचा गया है, पर व्यक्तिगत आत्मा को माया ने अविद्या या अज्ञान में बाँध रखा है. ‘प्रकृति’ को ईश्वर की माया कहा गया है. ‘प्रकृति’ की धारणा पर उपनिषदों में जो उपमाएँ दी गयी हैं ‒ नमक और जल, आग और चिनगारियाँ, मकड़ी और उसका तार, वंशी और ध्वनि ‒ उनमें सत् से भिन्न एक तत्त्व के अस्तित्व को स्वीकार किया गया है. इसे ही माया कह सकते हैं. फिर भी बल इसी बात पर है कि सापेक्ष निरपेक्ष पर आश्रित है. ध्वनि के बिना प्रतिध्वनि नहीं हो सकती.

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उपनिषदों का परम लक्ष्य मोक्ष है. जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति को हम काल की अधीनता से मुक्ति भी कह सकते हैं. यह कर्म की अधीनता से मुक्ति भी है. मुक्त आत्मा के कर्म चाहे वे अच्छे हों या बुरे, उस पर कोई प्रभाव नहीं डालते हैं. छान्दोग्योपनिषद् के अनुसार जिस प्रकार जल कमल की पत्ती पर नहीं ठहरता उसी प्रकार कर्म उससे चिपकते नहीं हैं. जिस प्रकार सरकंडे की डंडी आग में भस्म हो जाती है, उसी प्रकार उसके कर्म नष्ट हो जाते हैं. चन्द्रमा जिस प्रकार ग्रहण के बाद पूरा-पूरा बाहर आ जाता है, उसी प्रकार मुक्त आत्मा अपने को मृत्यु के बन्धन से स्वतन्त्र कर लेता है. मुक्ति बन्धन का नाश है और बन्धन अज्ञान की उपज है. अज्ञान ज्ञान से नष्ट होता है कर्मों से नहीं. ज्ञान हमें उस स्थिति पर ले जाता है जहाँ कामना शान्त हो जाती है, जहाँ सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं, जहाँ आत्मा ही अकेली कामना होती है. मुक्त आत्मा की वही स्थिति होती है जो कि एक अन्धे की दृष्टि प्राप्त कर लेने पर होती है. जब हम शाश्वत सत्य, ब्रह्म या आत्मा का ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं, तो कर्मों का हमारे ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. आचार में स्थित होते हुए भी वह धर्म और अधर्म से परे होता है, अन्यत्र धर्मात् अन्यत्राधर्मात् (कठोपनिषद् 1-2-14). जब हम जगत् से अधिक विराट, अधिक गहरी और अधिक मौलिक किसी सत्ता से भिज्ञ हो जाते हैं, तो हम क्षेत्रीयता से ऊपर उठ जाते हैं और पूरे दृश्य को देखने लगते हैं. हमारी आत्मा समस्त जगत् को व्याप्त कर लेती है. अनन्त को जान लेने से हम ईश्वर, जगत् और जीव के सच्चे स्वरूप को समझ लेते हैं. वस्तुत: आध्यात्मिक ज्ञान जगत् को नहीं मिटाता है बल्कि उसके सम्बन्ध में हमारे अज्ञान को मिटा देता है.

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उपनिषदों में ओम् शब्द को बहुत महत्त्व दिया गया है. कठोपनिषद् कहती है कि सारे वेद जिस पद का वर्णन करते हैं, जिसकी साधना के लिए सारे तप किये जाते हैं, जिसकी इच्छा से मुमुक्षुजन ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, वह पद है ओम्. यह अक्षर ही परब्रह्म है, यह अक्षर ही अपर ब्रह्म है, इस अक्षर को ही ‘यही उपास्य ब्रह्म है’ ऐसा जानकर जो पर अथवा अपर जिस ब्रह्म की इच्छा करता है, उसे वही प्राप्त हो जाता है. यदि उसका उपास्य परब्रह्म हो तो वह केवल जाना जा सकता है और यदि अपर ब्रह्म हो तो प्राप्त किया जा सकता है. यही ओंकार रूप आलम्बन ब्रह्म प्राप्ति के लिए सभी आलम्बनों में श्रेष्ठ यानी सबसे अधिक प्रशंसनीय है. इस आलम्बन को जान कर साधक परब्रह्म में स्थित होकर महिमान्वित होता है तथा अपरब्रह्म में ब्रह्मत्व को प्राप्त होकर ब्रह्म के समान उपासनीय होता है. माण्डूक्योपनिषद् के अनुसार यह जो कुछ भूत, भविष्यत् और वर्तमान है उसी की व्याख्या है; इसलिए यह सब ओंकार ही है. इसके सिवा जो तीनों कालों से परे, अपने कार्य से ही विदित होने वाला और काल से अपरिच्छेद्य आदि है वह भी ओंकार ही है. आत्मा और इसके पादों के साथ ओंकार और उसकी मात्राओं का तादात्म्य करते हुए कहा गया है कि वह यह आत्मा अक्षर दृष्टि से ओंकार है, वह मात्राओं को आश्रय करके स्थित है. पाद ही मात्रा हैं और मात्रा ही पाद हैं; वे मात्राएँ अकार, उकार, और मकार हैं. ब्रह्म का वैश्वानर रूप पहली मात्रा अकार है. जो उपासक इस प्रकार जानता है वह सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्त कर लेता है. तैजस ओंकार की द्वितीय मात्रा उकार है. जो उपासक ऐसा जानता है वह अपनी ज्ञान संतान का उत्कर्ष करता है, सबके प्रति समान होता है और उसके वंश में कोई ब्रह्मज्ञानहीन पुरुष नहीं होता. प्राज्ञ ब्रह्म ओंकार की तीसरी मात्रा मकार है. जो उपासक ऐसा जानता है वह इस सम्पूर्ण जगत् को माप लेता है अर्थात् इसका यथार्थ स्वरूप जान लेता है. अकार विश्व को प्राप्त करा देता है तथा उकार तैजस को और मकार प्राज्ञ को; किन्तु अमात्र में किसी की गति नहीं होती. मात्रा रहित होकर ओंकार तुरीय आत्मा ही है. जो उसे इस प्रकार जानता है वह स्वत: अपने आत्मा में ही प्रवेश कर जाता है. चित्त को ओंकार में समाहित करे; ओंकार निर्भय ब्रह्मपद है. ओंकार में नित्य समाहित रहने वाले व्यक्ति को कहीं भी भय नहीं होता. प्रणव ही सबका आदि, मध्य और अन्त है; प्रणव ही सबके हृदय में स्थित ईश्वर है. इस प्रकार सर्वव्यापी ओंकार को जानकर बुद्धिमान व्यक्ति शोक नहीं करता. जिसने मात्राहीन, अनन्त मात्रा वाले शिवमय ओंकार को जाना है, वही मुनि है और कोई नहीं. मुण्डकोपनिषद् के अनुसार प्रणव धनुष है, आत्मा बाण है और ब्रह्म उसका लक्ष्य कहा जाता है. उसका सावधानी से वेधन करना चाहिए और बाण को उसमें तन्मय हो जाना चाहिए अर्थात् ब्रह्म रूपी लक्ष्य से एकरूप हो जाना चाहिए. छान्दोग्य उपनिषद् कहती है कि हमें ॐ अक्षर की ही उपासना करनी चाहिए.

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