वेदों के अन्तिम भाग या उच्चतम दर्शन को वेदान्त या उपनिषद् कहा जाता है.



वेदों के अन्तिम भाग या उच्चतम दर्शन को वेदान्त या उपनिषद् कहा जाता है. अब वेदान्त शब्द का प्रयोग उस विशेष दर्शन के लिए भी होता है जो उपनिषदों पर आधारित है. शंकर ‘उपनिषद्’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘सद्’ धातु से मानते हैं, जिसका अर्थ है मुक्त करना, पहँचना या नष्ट करना. यह एक विशेष्य है जिसमें ‘उप’ और ‘नि’ उपसर्ग और क्विप् प्रत्यय लगे हैं. इसके अनुसार उपनिषद् का अर्थ होता है ब्रह्मज्ञान, जिसके द्वारा अज्ञान से मुक्ति मिलती है. दूसरे अर्थ में ‘उप’ (समीप) ‘नि’ (अच्छी तरह) और ‘सद्’ (बैठना) अर्थात् परमात्मा के समीप अच्छी तरह बैठाना ही उपनिषद् का ध्येय है. जिन ग्रन्थों में ब्रह्मज्ञान की चर्चा रहती है वे उपनिषद् कहलाते हैं. उपनिषदों में आध्यात्मिक अन्तर्दृष्टि एवं दार्शनिक तर्क प्रणाली दोनों के दर्शन होते हैं. श्वेताश्वतरोपनिषद् के अनुसार परमेश्वर वेदों के गुह्य भाग उपनिषदों में निहित है (तद्वेद गुह्योपनिषत्सु गूढ़ं). उपनिषद् ऐसा साहित्य है जो आदि काल से विकसित हो रहा है. भारतीय परम्परा में उपनिषदों की संख्या एक सौ आठ मानी गयी है. शंकराचार्य ने ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, बृहद् आरण्यक और श्वेताश्वतर- इन ग्यारह उपनिषदों का भाष्य किया है और ये ही सर्वसुलभ हैं.

 
 
श्री सुशील कुमार रचित गौरवशाली भारत (साहित्‍य सेवा सदन, निराला नगर, रायबरेली द्वारा प्रकाशित) पुस्‍तक से उद्धृत Excerpt from the book 'Gauravshali Bharat' written by Sushil Kumar Srivastava & published by 'Sahitya Sewa Sadan', Nirala Nagar, Rae Bareli

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