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माण्डूक्य उपनिषद् कहती है कि सब कुछ ब्रह्म ही है. साथ ही यह भी कहती है कि आत्मा ही ब्रह्म है. वह यह आत्मा चार पादों वाला है. यह उपनिषद् चेतना की चार अवस्थाओं ‒ जागरित, स्वप्न, प्रगाढ़ निद्रा और प्रकाशमय चेतन का विश्लेषण कर यह प्रतिपादित करती है कि इनमें से अन्तिम शेष तीन का आधार है. आत्मा का प्रथम पाद ‘वैश्वानर’ है जो जाग्रत् अवस्था या ब्रह्म के प्रकटीभूत रूप को दर्शाता है. इस अवस्था में आत्मा स्थूल विषयों का भोक्ता है. स्वप्न जिसका स्थान है तथा जो अन्त:प्रज्ञ है और सूक्ष्म विषयों का भोक्ता है, वह तैजस आत्मा का दूसरा पाद है. जिस अवस्था में सोया हुआ पुरुष किसी भोग की इच्छा नहीं करता और न स्वप्न ही देखता है उसे सुषुप्ति कहते हैं. वह सुषुप्ति जिसका स्थान है तथा जो एकभूत प्रकृष्ट ज्ञानस्वरूप होता हुआ ही आनन्दमय, आनन्द का भोक्ता और चेतनारूप मुख वाला है वह प्राज्ञ ही आत्मा का तीसरा पाद है. अपने स्वरूप में स्थित यह प्राज्ञ ही सर्वेश्वर है, सर्वज्ञ है, अन्तर्यामी है और समस्त जीवों की उत्पत्ति तथा लय का स्थान होने के कारण यह सबका कारण भी है. विभु विश्व बहिष्प्रज्ञ है, तैजस अन्त:प्रज्ञ है तथा प्राज्ञ घनप्रज्ञ (प्रज्ञानघन) है. इस प्रकार एक ही आत्मा तीन प्रकार से कहा जाता है. विश्व सर्वदा स्थूल पदार्थों को ही भोगने वाला है, तैजस सूक्ष्म पदार्थों का भोक्ता है तथा प्राज्ञ आनन्द को भोगने वाला है. यह सुनिश्चित बात है कि जो पदार्थ विद्यमान होते हैं उन्हीं सबकी उत्पत्ति हुआ करती है. बीजात्मक प्राण ही सबकी उत्पत्ति करता है और चेतनात्मक पुरुष चैतन्य के आभासभूत जीवों को अलग-अलग प्रकट करता है. सृष्टि के विषय में विचार करने वाले दूसरे लोग भगवान् की विभूति को ही जगत् की उत्पत्ति मानते हैं तथा दूसरे लोगों द्वारा यह सृष्टि स्वप्न और माया के समान मानी गयी है. कोई-कोई सृष्टि के विषय में ऐसा निश्चय रखते हैं कि ‘प्रभु की इच्छा ही सृष्टि है’. काल के विषय में विचार करने वाले ज्योतिषी लोग काल से ही जीवों की उत्पत्ति मानते हैं. कुछ लोग ‘सृष्टि भोग के लिए है’ ऐसा मानते हैं और कुछ ‘क्रीडा’ के लिए है’ ऐसा समझते हैं. परन्तु वास्तव में तो यह भगवान् का स्वभाव ही है; क्योंकि पूर्णकाम को इच्छा ही क्या हो सकती है. आत्मा का चौथा पाद सम्पूर्ण शब्द प्रवृत्ति के निमित्त से रहित है. अत: शब्द से उसका वर्णन नहीं किया जा सकता. अत: आत्मा के चौथे पाद ‘तुरीय’ के स्वरूप का वर्णन करना कठिन है. फिर भी विवेकीजन तुरीय को ऐसा मानते हैं कि वह न अन्त:प्रज्ञ है, न बहिष्प्रज्ञ है, न उभयत: (अन्तर्बहि:) प्रज्ञ है, न प्रज्ञानघन है, न प्रज्ञ है और न अप्रज्ञ है. बल्कि अदृष्ट, अव्यवहार्य, अग्राह्य, अलक्षण, अचिन्त्य, एकात्म प्रत्ययसार, प्रपंच का उपशम, शान्त, शिव और अद्वैत् रूप है. वही आत्मा है, वही साक्षात् जानने योग्य है. तुरीय आत्मा सब प्रकार के दु:खों की निवृत्ति में समर्थ है.





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