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सर्वव्यापी आत्मा का जीवात्माओं से क्या सम्बन्ध है? इस विषय में विभिन्न मत हैं. शंकर यह मानते हैं कि सर्वव्यापी आत्मा जीवात्मा से अभिन्न है. रामानुज कहते हैं कि जीवात्मा सर्वव्यापी आत्मा से शाश्वत रूप से अभिन्न है और भिन्न भी है. मध्व के अनुसार, जीवात्मा सर्वव्यापी आत्मा से शाश्वत रूप से भिन्न है. जीव को, एक प्रकार से, ईश्वर ने अपने रूप के अनुरूप और अपने सदृश रचा है. परन्तु सृष्ट के नाते उसका अपना रूप है. जीव के बिना न तो बन्धन हो सकता है और न मुक्ति. आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि मनुष्य सजीव सत्ताओं की शृंखला की एक कड़ी है, अनेक में से एक है. विज्ञान यह भी मानता है कि प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया होती है. इसी को हम इस प्रकार भी कह सकते हैं कि मनुष्य जो क्रिया करता है उसकी प्रतिक्रिया कर्मफल भोगने के रूप में होती है. जीवात्मा ही उपनिषदों के अनुसार कर्मफल भोगता है और कर्म ही उसे बन्धन में डालते हैं. कठ उपनिषद् जब यह कहती है कि परमेश्वर कर्मों का फल भोगता है (1-3-1), तो उसका संकेत यह होता है कि हम ईश्वर के प्रतिरूप और छवियाँ हैं, और जब हम अपने कर्मों का फल भोगते हैं तो वह भी भोगता है. इसी उपनिषद् के अनुसार आत्मा को रथी, शरीर को रथ, बुद्धि को सारथि और मन को लगाम समझना चाहिए. विेवेकी पुरुष इन्द्रियों को घोड़े बतलाते हैं तथा उनके घोड़े रूप से कल्पित किये जाने पर विषयों को उनके मार्ग बतलाते हैं और शरीर, इन्द्रिय एवं मन से युक्त आत्मा को भोक्ता कहते हैं. किन्तु जो बुद्धि रूप सारथि सर्वदा अविवेकी एवं असंयत चित्त से युक्त होता है उसके अधीन इन्द्रियाँ दुष्ट और बेकाबू घोड़ों के समान व्यवहार करती हैं. इसके विपरीत जो बुद्धि रूप सारथि कुशल और सर्वदा समाहित चित्त से युक्त होता है उसके अधीन इन्द्रियाँ इस प्रकार रहती हैं जैसे सारथि के अधीन अच्छे घोड़े. जो मनुष्य विवेकयुक्त बुद्धि-सारथि से युक्त और मन को वश में रखने वाला होता है, वह संसारमार्ग से पार होकर उस विष्णु (व्यापक परमात्मा) के परमपद को प्राप्त कर लेता है. आत्मा की एकता से जीवात्माओं के भेद असंगत नहीं हो जाते हैं. विभिन्न जीवात्माएँ ‘बुद्धि’ के साथ अपने संयोग के कारण भिन्न रहती हैं और इसलिए उनके कर्म के फल अलग-अलग होते हैं (बुद्धिभेदेन शेक्तृभेदात्). प्रत्येक मानव-शरीर में अमरता और मृत्यु दोनों के तत्त्व स्थित हैं. भ्रम के पालन से हम मृत्यु प्राप्त करते हैं, सत्य के पालन से हम अमरता प्राप्त करते हैं.





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