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ईशावास्योपनिषद् के अनुसार जगत् में जो कुछ स्थावर-जंगम संसार है, वह सब ईश्वर के द्वारा आच्छादनीय है. भगवान् पूर्ण हैं और चूँकि वे पूरी तरह अखण्ड हैं, अतएव उनके सारे उद्भव, तथा यह व्यवहार जगत् पूर्ण के रूप में परिपूर्ण है. पूर्ण से जो कुछ उत्पन्न होता है वह भी अपने में पूर्ण होता है. चूँकि वे पूर्ण हैं, अतएव उनसे न जाने कितनी पूर्ण इकाइयाँ उद्भूत होती हैं, तो भी वे पूर्ण रहते हैं (ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते. पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते.) ब्रह्म अपनी पूर्णता को खोये बिना जगत् का आधार है. सभी विशेषताओं से रहित होते हुए भी ब्रह्म जगत् का मूल कारण है. यदि कोई वस्तु किसी अन्य वस्तु से अलग टिक नहीं सकती तो दूसरी वस्तु उसका सार होती है. कारण का कार्य से पहले होना तर्कसिद्ध है. जिस प्रकार पृथिवी की वनस्पतियों को पृथिवी से अलग करके देखना अज्ञान का द्योतक है वैसे ही जगत् को परमेश्वर से अलग करके स्वतन्त्र अस्तित्व के रूप में देखना अज्ञान का कार्य है. जगत् ईश्वर की, सक्रिय प्रभु की रचना है.जगत् ईश्वर में और ईश्वर जगत् में समाया हुआ है. छान्दोग्य उपनिषद् में ब्रह्म को ‘तज्जलान्’ कहा गया है, अर्थात् वह (तत्) जो जगत् को जन्म देता है (ज), अपने में लीन कर लेता है (ला) और कायम रखता है (अन्). जगत् ब्रह्म में से आता है और ब्रह्म में लौट जाता है. जगत् ईश्वर की माया की शक्ति द्वारा रचा गया है, पर व्यक्तिगत आत्मा को माया ने अविद्या या अज्ञान में बाँध रखा है. ‘प्रकृति’ को ईश्वर की माया कहा गया है. ‘प्रकृति’ की धारणा पर उपनिषदों में जो उपमाएँ दी गयी हैं ‒ नमक और जल, आग और चिनगारियाँ, मकड़ी और उसका तार, वंशी और ध्वनि ‒ उनमें सत् से भिन्न एक तत्त्व के अस्तित्व को स्वीकार किया गया है. इसे ही माया कह सकते हैं. फिर भी बल इसी बात पर है कि सापेक्ष निरपेक्ष पर आश्रित है. ध्वनि के बिना प्रतिध्वनि नहीं हो सकती.





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