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उपनिषदें ‘अपरा विद्या’, निम्नतर ज्ञान और ‘परा विद्या’, उच्चतर ज्ञान में अन्तर करती हैं. अपरा विद्या से तात्पर्य वेदों और विज्ञानों में उपलब्ध ज्ञान से है. परा विद्या अविनाशी परमेश्वर और आत्मा के दिव्य स्वरूप का ज्ञान देती है. छान्दोग्य उपनिषद् में शास्त्रों के ज्ञाता और आत्मा के ज्ञाता के बीच भेद किया गया है. श्वेतकेतु वेदों का बहुत ज्ञान रखते हुए भी पुनर्जन्म के प्रश्न को समझ नहीं पाता है. कठोपनिषद् बताती है कि उस कठिनता से दीख पड़ने वाले पुरातन गूढ़ स्थान में अनुप्रविष्ट, बुद्धि में स्थित, गहन स्थान में रहने वाले पुरातन देव को तर्क से नहीं बल्कि अध्यात्म योग के द्वारा जाना जाता है. सत्य की प्राप्ति बुद्धि के बल से या बहुत अध्ययन से नहीं होती है, बल्कि जिसकी इच्छा ईश्वर में शान्ति से केन्द्रित हो जाती है, सत्य उसके सम्मुख प्रकट हो जाता है. जो अपनी निष्ठा बुद्धि में रखते हैं वे ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते, पर जो बालकों जैसे हैं, वे उसकी सत्ता को अनुभव कर लेते हैं. बाल्य भाव में विनम्रता, ग्रहणशीलता या शिक्षणीयता और तत्परता से खोज शामिल है. मूल विन्दु यह है कि हमें पाण्डित्य का अभिमान छोड़ देना चाहिए.





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