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आध्यात्मिक जीवन के अनुसरण के लिए आध्यात्मिक अभिरुचि आवश्यक है. बृहदारण्यक उपनिषद् में याज्ञवल्क्य अपनी समस्त पार्थिव सम्पत्ति को अपनी दो पत्नियों कात्यायनी और मैत्रेयी में विभाजित करने का प्रस्ताव रखते हैं. मैत्रेयी पूछती है कि क्या धन-सम्पत्ति से भरा सम्पूर्ण जगत् उसे अनन्त जीवन प्रदान कर सकता है? याज्ञवल्क्य कहते हैं, “नहीं, तुम्हारा जीवन केवल उन मनुष्यों जैसा हो जायेगा जिनके पास बहुत कुछ है, पर धन-सम्पत्ति से अनन्त जीवन की कोई आशा नहीं की जा सकती.” मैत्रेयी तब जगत् के ऐश्वर्य को ठुकराती हुई कहती है, “जो मुझे अमर नहीं बना सकता उसका मैं क्या करूँगी?” याज्ञवल्क्य अपनी पत्नी की आध्यात्मिक पात्रता को स्वीकार करते हैं और उसे सर्वोच्च ज्ञान का उपदेश देते हैं. हम इसे इस प्रकार से भी कह सकते हैं कि उपनिषदों में नैतिक तैयारी पर बल दिया गया है. यदि हम दुष्कर्म से बचते नहीं हैं, यदि हमारा मन स्थिर नहीं है, तो हम आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते.





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