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जब तक हम अहं को मिटाते नहीं और दिव्य मूलाधार में स्थित नहीं हो जाते, तब तक हम संसार नाम के अनन्त घटना-क्रम से बँधे रहते हैं. इस घटना-जगत् को जो तत्त्व शासित करता है वह कर्म कहलाता है. किन्तु इसका यह अर्थ नहीं निकालना चाहिए कि हमें कर्मफल से मुक्ति पाने के लिए कर्म का ही त्याग कर देना चाहिए. ईशावास्योपनिषद् का कहना है कि इस लोक में कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए. अकर्मण्यता सबसे बड़ा अभिशाप है. यहाँ कर्म का अर्थ अग्निहोत्रादि कर्मकाण्ड से नहीं है बल्कि जीवन-यापन की तथा दान आदि की क्रियाओं से है. कर्मफल से बचने के लिए निर्लिप्त होकर कर्म करना चाहिए. दुष्कर्म की ओर प्रवृत्ति किसी इच्छा की पूर्ति के लिए ही होती है. श्वेताश्वतर उपनिषद् के अनुसार ईश्वर कर्माध्यक्ष है. ईश्वर नियम भी है और प्रेम भी है. उसका प्रेम नियम के माध्यम से प्रकट होता है. कर्म की क्रिया पूर्णतया आवेगरहित और न्यायसंगत है, वह न क्रूर है न दयालु है.





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