![]()
यदि कोई सोचता है कि मनुष्यों के दुष्कर्म ऊपर आकाश को उड़ते हैं और तब कोई हाथ उनका लेखा-जोखा ईश्वर की पट्टियों पर लिखता है, और ईश्वर, उन्हें पढ़-पढ़ कर, संसार का न्याय करता है तो वह बहुत बड़े भ्रम में है. ईश्वर आनन्द का स्रष्टा है और ऐसा शासक है जहाँ उसे स्वयं दण्ड देने की आवश्यकता नहीं रहती है. प्रत्येक अन्याय किसी सकाम कर्म के कारण उत्पन्न होता है. कर्म की प्रतिक्रिया अन्यायी को दण्ड देती है. जीवात्मा का पुनर्जन्म हिसाब-किताब बराबर करने का अवसर उपस्थित करता है. मनुष्य अच्छे कामों से अच्छा और बुरे कामों से बुरा बनता है. कठोपनिषद् कहती है कि मनुष्य खेती की तरह पकता (वृद्ध होकर मर जाता) है और खेती की भाँति फिर उत्पन्न हो जाता है. मनुष्य किस तरह मरता है और पुन: जन्म लेता है इसे बृहदारण्यक उपनिषद् में कई उदाहरणों से स्पष्ट किया गया है. जिस प्रकार जोंक जब घास की लम्बी पत्ती के अन्तिम सिरे पर पहुँच जाती है तो वह सहारे के लिए कोई और स्थान खोज लेती है और फिर अपने को उसकी ओर खींचती है, उसी प्रकार यह जीवात्मा इस शरीर के अन्त पर पहुँच कर सहारे के लिए कोई और स्थान खोज लेता है और अपने को उसकी ओर खींचता है. आत्मा जो प्राणों में बुद्धिवृत्तियों के भीतर रहने वाला विज्ञानमय ज्योतिस्वरूप पुरुष है, वह इस लोक और परलोक दोनों में संचार करता है. जिस प्रकार सुनार सुवर्ण का भाग लेकर दूसरे नवीन और कल्याणतर (अधिक सुन्दर) रूप की रचना करता है, उसी प्रकार यह आत्मा इस शरीर को नष्ट कर कोई और नवीन एवं अधिक सुन्दर रूप धारण कर लेता है. मनुष्य जब तक सच्चा ज्ञान प्राप्त नहीं कर लेता तब तक पुनर्जन्म ही उसकी नियति है. सत्कर्मों से वह अपने क्रमिक विकास को आगे बढ़ाता है. सत्य के ज्ञान से मुक्ति प्राप्त होती है.





0 Comments:
Post a Comment
Links to this post:
Create a Link