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उपनिषदों में आत्मनिग्रह को आध्यात्मिक जीवन का मूल माना जाता है. किन्तु इसका अर्थ जगत् की उपेक्षा करना अथवा गृह और सम्पत्ति का त्याग करना नहीं है. जगत् के प्रति घृणा से हम जगत् के ऊपर नहीं उठ सकते. ईशोपनिषद् कहती है कि संसार में जो भी जड़-चेतन है, उसका स्वामी परमेश्वर है. मनुष्य को त्याग भाव से अपना पालन करना चाहिए, अन्य किसी के हिस्से के धन को पाने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए. छान्दोग्य उपनिषद् में यह प्रसंग आता है कि पाँच विद्वान ब्राह्मण वैश्वानर आत्मा के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा से जब उद्दालक आरुणि के पास पहुँचते हैं तो वे उन्हें राजा अश्वपति कैकय के पास ले जाते हैं. राजा पहले यह सिद्ध करते हैं कि उनके जो मत हैं वे अपूर्ण हैं और फिर उन्हें उपदेश देते हैं. काशी के राजा अजातशत्रु गार्ग्य बालाकि को पहले उसके द्वारा प्रस्तुत बारह मतों के दोष दिखाते हैं और फिर उसे ब्रह्म का स्वरूप समझाते हैं. स्पष्ट है कि उपनिषदों का ज्ञान एक गृहस्थ और राज्य के शासक के मुख से भी प्रस्फुटित हो सकता है. इसी प्रकार ब्रह्म विद्या प्राप्त करने के लिए शिष्य का कुलवान होना आवश्यक नहीं है. जबाला के पुत्र सत्यकाम ने माँ से अपने गोत्र का नाम पूछा तो जबाला ने कहा कि वह परिचारिका का कार्य करती थी और उसे नहीं मालूम कि उसका पिता कौन है. अत: वह गुरुकुल में अपने को ‘सत्यकाम जाबाल’ बतला दे. सत्यकाम ने गुरु गौतम से सब कुछ सच-सच बतला दिया. सत्यवादी होने के आधार पर ही गौतम ने उसे ब्राह्मण मान लिया और उसका उपनयन कर दिया. कुल की शुद्धता के बजाय जोर मन की शुद्धता और सदाचरण पर है. ईशोपनिषद् कहती है कि “हे सर्वशक्तिमान भगवान् तू समस्त ज्ञान और कर्मों को जानने वाला है, हमें सन्मार्ग से ले चल (नय सुपथा). मुण्डकोपनिषद् कहती है, “सत्य ही जय को प्राप्त होता है, मिथ्या नहीं (सत्यमेव जयति नानृतं). सत्य से आप्तकाम ऋषि लोग उस पद को प्राप्त होते हैं जहाँ वह सत्य का परम निधान वर्तमान है. तैत्तिरीयोपनिषद् में आचार्य शिष्य को उपदेश देता है ‒ सत्य बोल (सत्यं वद), धर्म का आचरण कर (धर्मं चर), स्वाध्याय से प्रमाद न कर (स्वाध्यायान्मा प्रमद:), जो अनिन्द्य कर्म हैं उन्ही का सेवन कर, दूसरों का नहीं.





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