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उपनिषदों में ओम् शब्द को बहुत महत्त्व दिया गया है. कठोपनिषद् कहती है कि सारे वेद जिस पद का वर्णन करते हैं, जिसकी साधना के लिए सारे तप किये जाते हैं, जिसकी इच्छा से मुमुक्षुजन ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, वह पद है ओम्. यह अक्षर ही परब्रह्म है, यह अक्षर ही अपर ब्रह्म है, इस अक्षर को ही ‘यही उपास्य ब्रह्म है’ ऐसा जानकर जो पर अथवा अपर जिस ब्रह्म की इच्छा करता है, उसे वही प्राप्त हो जाता है. यदि उसका उपास्य परब्रह्म हो तो वह केवल जाना जा सकता है और यदि अपर ब्रह्म हो तो प्राप्त किया जा सकता है. यही ओंकार रूप आलम्बन ब्रह्म प्राप्ति के लिए सभी आलम्बनों में श्रेष्ठ यानी सबसे अधिक प्रशंसनीय है. इस आलम्बन को जान कर साधक परब्रह्म में स्थित होकर महिमान्वित होता है तथा अपरब्रह्म में ब्रह्मत्व को प्राप्त होकर ब्रह्म के समान उपासनीय होता है. माण्डूक्योपनिषद् के अनुसार यह जो कुछ भूत, भविष्यत् और वर्तमान है उसी की व्याख्या है; इसलिए यह सब ओंकार ही है. इसके सिवा जो तीनों कालों से परे, अपने कार्य से ही विदित होने वाला और काल से अपरिच्छेद्य आदि है वह भी ओंकार ही है. आत्मा और इसके पादों के साथ ओंकार और उसकी मात्राओं का तादात्म्य करते हुए कहा गया है कि वह यह आत्मा अक्षर दृष्टि से ओंकार है, वह मात्राओं को आश्रय करके स्थित है. पाद ही मात्रा हैं और मात्रा ही पाद हैं; वे मात्राएँ अकार, उकार, और मकार हैं. ब्रह्म का वैश्वानर रूप पहली मात्रा अकार है. जो उपासक इस प्रकार जानता है वह सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्त कर लेता है. तैजस ओंकार की द्वितीय मात्रा उकार है. जो उपासक ऐसा जानता है वह अपनी ज्ञान संतान का उत्कर्ष करता है, सबके प्रति समान होता है और उसके वंश में कोई ब्रह्मज्ञानहीन पुरुष नहीं होता. प्राज्ञ ब्रह्म ओंकार की तीसरी मात्रा मकार है. जो उपासक ऐसा जानता है वह इस सम्पूर्ण जगत् को माप लेता है अर्थात् इसका यथार्थ स्वरूप जान लेता है. अकार विश्व को प्राप्त करा देता है तथा उकार तैजस को और मकार प्राज्ञ को; किन्तु अमात्र में किसी की गति नहीं होती. मात्रा रहित होकर ओंकार तुरीय आत्मा ही है. जो उसे इस प्रकार जानता है वह स्वत: अपने आत्मा में ही प्रवेश कर जाता है. चित्त को ओंकार में समाहित करे; ओंकार निर्भय ब्रह्मपद है. ओंकार में नित्य समाहित रहने वाले व्यक्ति को कहीं भी भय नहीं होता. प्रणव ही सबका आदि, मध्य और अन्त है; प्रणव ही सबके हृदय में स्थित ईश्वर है. इस प्रकार सर्वव्यापी ओंकार को जानकर बुद्धिमान व्यक्ति शोक नहीं करता. जिसने मात्राहीन, अनन्त मात्रा वाले शिवमय ओंकार को जाना है, वही मुनि है और कोई नहीं. मुण्डकोपनिषद् के अनुसार प्रणव धनुष है, आत्मा बाण है और ब्रह्म उसका लक्ष्य कहा जाता है. उसका सावधानी से वेधन करना चाहिए और बाण को उसमें तन्मय हो जाना चाहिए अर्थात् ब्रह्म रूपी लक्ष्य से एकरूप हो जाना चाहिए. छान्दोग्य उपनिषद् कहती है कि हमें ॐ अक्षर की ही उपासना करनी चाहिए.





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