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बृहदारण्यक उपनिषद् के अनुसार मेघगर्जना रूपी दैवी वाक् कामी, क्रोधी और लोभी स्वभाव वालों के लिए एक ही संदेश द द द देती है. कामी व्यक्ति के लिए सन्देश है दमन का क्योंकि उसमें इन्द्रिय लोलुपता होती है. क्रोधी और उद्दण्ड व्यक्ति के लिए सन्देश है दया का क्योंकि वह क्रूर होता है. लोभी व्यक्ति के लिए सन्देश है दान का क्योंकि दान करने से धनलोलुपता नहीं रह जाती. केन उपनिषद् में देवी -देवताओं तक को घमण्ड न करने की चेतावनी दी गयी है क्योंकि उनकी शक्ति और उनका तेज वस्तुत: ब्रह्म की शक्ति और ब्रह्म का तेज ही है. कठ उपनिषद् के अनुसार इन्द्रियों की अपेक्षा उनके विषय श्रेष्ठ हैं, विषयों से मन उत्कृष्ट है, मन से बुद्धि श्रेष्ठ है और बुद्धि से महान् आत्मा उत्कृष्ट है. आत्मा (महत्तत्त्व) से मूल प्रकृति (अव्यक्त) श्रेष्ठ है और अव्यक्त से भी परब्रह्म श्रेष्ठ है. परब्रह्म से परे कुछ भी नहीं है, वही परम गति है. सम्पूर्ण भूतों मे छिपा हुआ यह आत्मा प्रकाशवान् नहीं होता. यह सूक्ष्मदर्शी पुरुषों द्वारा अपनी तीव्र और सूक्ष्मबुद्धि से ही देखा जाता है. विवेकी पुरुष वाक् इन्द्रिय (वाणी) का मन में उपसंहार करे, मन का प्रकाशस्वरूप बुद्धि में लय करे, बुद्धि को महत्तत्त्व में लीन करे और महान् आत्मा को मुख्य आत्मा में नियुक्त करे. अरे अविद्याग्रस्त लोगो! उठो, जागो और श्रेष्ठ पुरुषों के समीप जाकर ज्ञान प्राप्त करो. जिस प्रकार छूरे की धार तीक्ष्ण और दुस्तर होती है, तत्त्वज्ञानी लोग उस मार्ग को वैसा ही दुर्गम बतलाते हैं.
उत्तिष्ठ जाग्रत प्राप्य वरान्नि बोधत.
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया
दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति.





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