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उपनिषदों का चिन्तन ब्राह्मणों के कर्मकाण्ड-सम्बधी सिद्धान्तों की तुलना में प्रगति का सूचक है. इसीलिए उपनिषदों में हमें खोखले और बेकार कर्मकाण्डी धर्म की आलोचना मिलती है. यज्ञों का स्थान गौण हो जाता है. उनसे अन्तिम मुक्ति नहीं मिलती. जब सभी वस्तुएँ ईश्वर की हैं तो उसे अपनी इच्छा और अहं के अतिरिक्त कोई अन्य वस्तु समर्पित करने की आवश्यकता नहीं है. प्रार्थना और यज्ञ दर्शन तथा आत्मिक जीवन के साधन हैं. सच्चा यज्ञ अपने अहं का त्याग है. प्रत्येक होम में स्वाहा कहा जाता है, जिससे अभिप्राय स्वत्व के हनन अर्थात् अहं के त्याग से है. प्रार्थना सत्य का अन्वेषण है, जिसके लिए चेतना के उत्थान द्वारा अन्त:स्थित अज्ञात में प्रवेश करना होता है. प्रार्थना का आरम्भ श्रद्धा से, जिससे प्रार्थना की जाती है उसमें पूर्ण विश्वास से है और इस सरल आस्था से होता है कि ईश्वर हमारा उपकार कर सकता है और हमारे प्रति दयालु है. यहाँ लक्ष्य आनन्द की स्वर्गीय स्थिति या इससे किसी अच्छे लोक में फिर से जन्म लेने का नहीं है, बल्कि कर्म के सांसारिक बन्धन से छूटकर उस परम चैतन्य के साथ एकाकार होना और मुक्ति है. उपनिषदें वेदों का उल्लेख सामान्यतया आदर के साथ करती हैं और उनका अध्ययन एक महत्तवपूर्ण कर्तव्य माना जाता है. लेकिन कई बार यह कहा गया है कि अकेले वैदिक ज्ञान से काम नहीं चलेगा. नारद सनत्कुमार से कहते हैं कि उन्होंने वेदों से लेकर नागविद्या तक सभी तरह का ज्ञान प्राप्त किया है, पर अभी उन्हें आत्मज्ञान नहीं हुआ है.





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