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उपनिषदों में परम सत्य के लिए ‘ब्रह्म’ शब्द प्रयुक्त हुआ है. यह ‘बृह्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ ‘बढ़ना’,‘बाहर को फूटना’ होता है. इस व्युत्पत्ति से उमड़ती, उफनती, अनवरत वृद्धि ‘बृहत्तवम्’ की व्यंजना होती है. विश्व आत्मा और उससे मिलने की आकांक्षा रखने वाली मनुष्य की आत्मा में जो मूल सम्बन्ध है, ब्रह्म शब्द उसका अभिव्यंजक है. मुण्डकोपनिषद् में ब्रह्म के स्वरूप के सम्बन्ध में कुछ कहने के पूर्व यह कहा गया है कि दो विद्याएँ जानने योग्य हैं- एक परा और दूसरी अपरा. उनमें ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष का अध्ययन अपरा विद्या के अन्तर्गत किया जाता है तथा जिससे उस अक्षर ब्रह्म का ज्ञान होता है वह परा है. जिस प्रकार मकड़ी जाले को बनाती और निगल जाती है, जैसे पृथिवी में ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं और जैसे सजीव पुरुष से केश और लोम उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार उस अक्षर ब्रह्म से यह विश्व प्रकट होता है. ज्ञानेन्द्रियों के लिए ब्रह्म अदृश्य, अग्राह्य, हाथ-पैर से हीन, अत्यन्त सूक्ष्म है किन्तु सम्पूर्ण भूतों का कारण होने से विवेकी लोग उसे सर्वत्र देखते हैं. जिस प्रकार अत्यन्त प्रदीप्त अग्नि से उसी के समान रूप वाले हजारों स्फुलिंग (चिनगारियाँ) निकलते हैं, उसी प्रकार ब्रह्म से अनेकों भाव प्रकट होते हैं और उसी में लीन हो जाते हैं.





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