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ब्रह्म निश्चय ही दिव्य, अमूर्त, बाहर-भीतर विद्यमान, अजन्मा, अप्राण, मनोहीन, विशुद्ध तथा अपने सम्पूर्ण विकारों से श्रेष्ठ है ब्रह्म से ही प्राण उत्पन्न होता है तथा इससे ही मन, सम्पूर्ण इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, तेज, जल और सारे संसार को धारण करने वाली पृथिवी उत्पन्न होती है. सूर्य, चन्द्रमा, तारे, अग्नि आदि सब उसी के प्रकाश से प्रकाशमान हैं. यह अमृत ब्रह्म ही आगे है, ब्रह्म ही पीछे है, ब्रह्म ही दायीं-बायीं ओर है तथा ब्रह्म ही नीचे-ऊपर फैला हुआ है. यह सारा जगत् सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म ही है. वह महान् दिव्य और अचिन्त्य रूप है. वह सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर भासमान होता है तथा दूर से भी दूर और इस शरीर में अत्यन्त समीप भी है. वह चेतनावान् प्राणियों में इस शरीर के भीतर उनकी बुद्धि रूप गुहा में छिपा हुआ है. तैत्तिरीय उपनिषद् कहती है कि ‘‘जिससे ये सत्ताएँ जन्मी हैं, जिसमें जन्म लेने के बाद रहती हैं और जिसमें अपनी मृत्यु के बाद चली जाती हैं, वह ब्रह्म है.’’ यह निश्चित रूप से घोषणा करती है कि ब्रह्म सत्य है, ज्ञान है, अनन्त है (सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म). आनन्द ब्रह्म है (आनन्दो ब्रहनेति). आनन्द से ही सब जीव पैदा होते हैं और आनन्द में ही फिर समा जाते हैं.





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