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बृहदारण्यक उपनिषद् का यह कहना है कि ब्रह्म सत् है, ‘सन्मात्र हि ब्रह्म’. ऋग्वेद भी ब्रह्म के लिए सत् का प्रयोग कर कहता है कि सत् तो एक ही है, विद्वान लोग उसे भिन्न-भिन्न दृष्टि से देखते हैं. सत् विशुद्ध स्वीकृति का द्योतक है, जिसमें किसी भी प्रकार का अस्वीकार नहीं है. सत् के सत्य को माने बिना हम युक्तियुक्त जीवन नहीं जी सकते. छान्दोग्य उपनिषद् के अनुसार यह सारा जगत् निश्चय ही ब्रह्म है (सर्वं खल्विदं ब्रह्म), यह उसी से उत्पन्न होने वाला, उसी में लीन होने वाला और उसी में चेष्टा करने वाला है. वह (ब्रह्म) मनोमय, प्राणशरीर, प्रकाशस्वरूप, सत्यसंकल्प, आकाशशरीर, सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगन्ध, सर्वरस, इस सम्पूर्ण जगत् को सब ओर से व्याप्त करने वाला, वाक्-रहित और सम्भ्रमशून्य है. श्वेताश्वतर उपनिषद् के अनुसार ब्रह्म न स्त्री है, न पुरुष है और न नपुंसक ही है. यह जो-जो शरीर धारण करता है उसी-उसी से सुरक्षित रहता है. जिससे उत्कृष्ट और कोई नहीं है तथा जिससे छोटा और बड़ा भी कोई नहीं वह अपनी द्योतनात्मक महिमा में वृक्ष के समान निश्चल भाव से स्थित है, उस पुरुष ने ही इस सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त कर रखा है. वह भगवान् सम्पूर्ण जीवों के अन्त:करणों में स्थित और सर्वव्यापी है; इसलिए सर्वगत और मंगलरूप (शिव) है. वह महान्, परम समर्थ, शरीर रूप पुर में शयन करने वाला, अन्त:करण को प्रेरित करने वाला, सबका शासक, प्रकाशस्वरूप और अविनाशी है. वह समस्त इन्द्रिय वृत्तियों के रूप में अवभासित होता हुआ भी समस्त इन्द्रियों से रहित है, तथा सबका प्रभु, शासक और सबका आश्रय एवं कारण है. वह हाथ-पाँव से रहित होकर भी वेगवान् और ग्रहण करने वाला है, नेत्रहीन होकर भी देखता है और कर्णरहित होकर भी सुनता है. वह सर्वज्ञ है किन्तु उसे जानने वाला कोई नहीं है.





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