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ऋषियों ने उसे सबका आदि, पूर्ण और महान् कहा है. यह अणु से भी अणु और महान् से भी महान् (अणोरणीयान् महतो महीयान्) परमात्मा इस जीव के अन्त:करण में स्थित है. ब्रह्मवेत्ता लोग उसके जन्म का अभाव बतलाते हैं और उसे नित्य कहते हैं, वह जराशून्य पुरातन सर्वात्मा विभु होने के कारण सर्वगत है. समस्त प्राणियों में स्थित एक देव है; वह सर्वव्यापक समस्त भूतों का अन्तरात्मा, कर्मों का अधिष्ठाता, समस्त प्राणियों में बसा हुआ, सबका साक्षी, सबको चेतनत्व प्रदान करने वाला, शुद्ध और निर्गुण है. जो एक अद्वितीय स्वतन्त्र परमात्मा बहुत से निष्क्रिय जीवों के एक बीज को अनेक रूप कर देता है, अपने अन्त:करण में स्थित उस देव को जो मतिमान् देखते हैं उन्हें ही नित्यसुख प्राप्त होता है, दूसरों को नहीं. वह परमात्मदेव नित्यों में नित्य है, चेतनों में चेतन. बहुतों में एक हैं. सबकी कामनाओं को पूरा करने वाला है. ज्ञान से, योग से उस कारण पुरुष को जान लेना चाहिए. ऐसा करने से मनुष्य सब प्रकार के बन्धनों से मुक्त हो जाता है.





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