ब्रह्म और उसकी सृष्टि को अलग नहीं किया जा सकता.



निर्गुण ब्रह्म के स्वरूप की व्याख्या नहीं की जा सकती किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं निकालना चाहिए कि उसका कोई स्वरूप नहीं है. तैत्तिरीय उपनिषद् का यह कथन ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ वस्तुत: ब्रह्म के स्वरूप को प्रकट करता है. शंकराचार्य के अनुसार ये ब्रह्म के गुण को नहीं बल्कि उसके स्वरूप को ही व्यक्त करते हैं. उसका स्वरूप ‘सत्’ अर्थात् सत्ता, ‘चित्त’ अर्थात् चेतना और ‘आनन्द’ कहा गया है. एक ही सत्ता के लिए ये विभिन्न उक्तियाँ है. आत्मसत्ता, आत्मचेतना और आत्मानन्द एक हैं. वह पूर्ण सत्ता है जिसमें कोई अनस्तित्व नहीं है. वह पूर्ण चेतना है जिसमें कोई जड़ता नहीं है. वह पूर्ण आनन्द है जिसमें कोई दु:ख या आनन्द का अभाव नहीं है. सभी वस्तुएँ, जिनका अस्तित्व है, अपने-अपने रूप में ब्रह्म के ‘सत्’, ‘चित्त’ और आनन्द स्वरूप की कारण हैं. वह सभी वस्तुओं में रहता है और फिर भी उनसे परे है. ‘हिरण्यगर्भ’ हर बार जगत् के आरम्भ में आविर्भूत होता है और हर बार जगत् के अन्त में लुप्त हो जाता है. ‘हिरण्यगर्भ’ जगत् की रचना शाश्वत वेद के अनुसार करता है, जिसमें वस्तुओं के सभी प्रकारों के मूल नमूने शाश्वत रूप से अन्तर्निहित हैं. उसे ‘ब्रह्मा’ या ‘विश्व-आत्मा’ भी कहा जाता है. वह कार्य ब्रह्म है और ‘ईश्वर’ से जो कारण ब्रह्म है पृथक है. उपनिषदों में ‘ईश्वर’ और ‘हिरण्यगर्भ’ या ‘विश्व-आत्मा’ के बीच स्पष्ट भेद नहीं किया गया है. शंकर और रामानुज दोनों के लिए ‘हिरण्यगर्भ’ एक अप्रधान और रचे हुए स्रष्टा की स्थिति रखता है. ‘ईश्वर’ शाश्वत है और वह उत्पन्न होते और मिटते जगतों के इस खेल में शामिल नहीं होता बल्कि उसका निर्देशन करता है और स्वयं अनुभवातीत रूप से अनादिकाल से विद्यमान है. जैसे पृथिवी को और उसमें उत्पन्न वनस्पतियों को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता वैसे ब्रह्म और उसकी सृष्टि को अलग नहीं किया जा सकता. परब्रह्म, कारणब्रह्म, कार्यब्रह्म और व्यक्तब्रह्म एक ही सत्य के विभिन्न पक्ष हैं.

 
 
श्री सुशील कुमार रचित गौरवशाली भारत (साहित्‍य सेवा सदन, निराला नगर, रायबरेली द्वारा प्रकाशित) पुस्‍तक से उद्धृत Excerpt from the book 'Gauravshali Bharat' written by Sushil Kumar Srivastava & published by 'Sahitya Sewa Sadan', Nirala Nagar, Rae Bareli

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