उपनिषदों का संदेश
वेदों के अन्तिम भाग या उच्चतम दर्शन को वेदान्त या उपनिषद् कहा जाता है.ब्रह्मसूत्र उपनिषदों की शिक्षा का संक्षिप्त सार है.सच्चा यज्ञ अपने अहं का त्याग है और परम लक्ष्य परम चैतन्य के साथ एकाकार होना है.उपनिषदों में परम सत्य के लिए ‘ब्रह्म’ शब्द प्रयुक्त हुआ है जिससे यह विश्व प्रकट होता है.ब्रह्म सत्य है, ज्ञान है, अनन्त है, आनन्द है.वह भगवान् सम्पूर्ण जीवों के अन्त:करणों में स्थित, सर्वव्यापी और मंगलरूप (शिव) है.परमात्मा सबकी कामनाओं को पूरा करने वाला है.सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही ब्रह्म का शरीर या विराट रूप है किंतु उस पर मानव रूप या मानवीय गुण आरोपित नहीं करना चाहिए.ब्रह्म और उसकी सृष्टि को अलग नहीं किया जा सकता.आत्मा ही ब्रह्म है और चार पादों वाला है.सर्वव्यापक आत्मा को जानकर बुद्धिमान पुरुष शोक नहीं करता.मनुष्य जो क्रिया करता है उसकी प्रतिक्रिया कर्मफल भोगने के रूप में होती है.जगत् ईश्वर की माया की शक्ति द्वारा रचा गया है, पर व्यक्तिगत आत्मा को माया ने अज्ञान में बाँध रखा है.उपनिषदें ‘अपरा विद्या’, निम्नतर ज्ञान और ‘परा विद्या’, उच्चतर ज्ञान में अन्तर करती हैं.यदि हम दुष्कर्म से बचते नहीं हैं, यदि हमारा मन स्थिर नहीं है, तो हम आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते.कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए.ईश्वर दण्ड नहीं देता. कर्म की प्रतिक्रिया अन्यायी को दण्ड देती है.आत्मनिग्रह आध्यात्म के लिये आवश्यक है किन्तु इसका अर्थ जगत् की उपेक्षा करना अथवा गृह और सम्पत्ति का त्याग करना नहीं है.उपनिषदों का परम लक्ष्य मोक्ष है.उपनिषदों में ओम् शब्द पूर्ण परमेश्वर का पर्याय है.उठो, जागो और परम ज्ञान प्राप्त करो.
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Sahitya Sewa Sadan, Rae Bareli Open this Placemark
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